भगवान के व्यक्तिगत स्वरूप की स्थापना
श्री ईशोपनिषद के आधार पर भगवान के व्यक्तिगत स्वरूप की स्थापना प रम सत्य की अवधारणा सभी शक्तियों के सर्वोत्तम स्रोत को इंगित करता हैI वह परम सत्य ही सर्वोच्च है , इस परम सत्य की अवधारणा को समझने की भी कई श्रेणियां हैं, और समझने वालों की भी कई श्रेणियां हैंI मुख्य रूप से मानव समाज को दो श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं :-1. नास्तिक 2. आस्तिक , नास्तिक व्यक्ति ईश्वर की सत्ता को नकारता है उसे शरीर आत्मा के भेद का कोई ज्ञान नहीं होता है और मुख्यतः इंद्रिय तृप्ति के कर्मों में जीवन यापन करता है वह ईश्वर को न करता है किंतु उनकी शक्तियों को ही सब कुछ समझता हैI दूसरी श्रेणी है:- आस्तिक या अध्यात्मवादी की, जिन्हें शरीर और आत्मा के भेद का ज्ञान होता है, किंतु परम सत्य की अवधारणाएं अलग - अलग होती हैं, कोई कहता है ईश्वर शून्य है ( शुन्य वाद), कोई कहता है ईश्वर निराकार है, निर्विशेष ब्...