भगवान के व्यक्तिगत स्वरूप की स्थापना

 

Why do people of ISKCON (Hare Krishna Movement) dislike Swami ...



श्री ईशोपनिषद

के

आधार पर

 भगवान के व्यक्तिगत स्वरूप की स्थापना

What is the real truth of life? - Quoraरम सत्य की अवधारणा सभी शक्तियों के सर्वोत्तम स्रोत को इंगित करता हैI वह परम सत्य ही सर्वोच्च है, इस परम सत्य की अवधारणा को समझने की भी कई श्रेणियां हैं, और समझने वालों की भी कई श्रेणियां हैंI मुख्य रूप से मानव समाज को दो श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं :-1. नास्तिक  2. आस्तिक , नास्तिक व्यक्ति ईश्वर की सत्ता को नकारता है उसे शरीर आत्मा के भेद का कोई ज्ञान नहीं होता है और मुख्यतः इंद्रिय तृप्ति के कर्मों में जीवन यापन करता है वह ईश्वर को करता है किंतु उनकी शक्तियों को ही सब कुछ समझता हैI दूसरी श्रेणी है:- आस्तिक या अध्यात्मवादी की,  जिन्हें शरीर और आत्मा के भेद का ज्ञान होता है, किंतु परम सत्य की अवधारणाएं अलग-अलग होती हैं, कोई कहता है  ईश्वर शून्य है  (शुन्यवाद),   कोई कहता है  ईश्वर निराकार है, निर्विशेष  ब्रह्म ज्योति है (निर्विशेषवाद या मायावाद) और कोई ईश्वर को साकार  कहते हैंI

Sri Isopanisad - Srila Prabhupada book, iskcon book - buy, online ... तो वास्तव में परम सत्य क्या है? वह कैसा है?  उसकी क्या-क्या अनुभूतियां हैं?  इन सभी प्रश्नों के उत्तर की व्याख्या हम यहां अपने वैदिक शास्त्रों के आधार पर करेंगे, और जानेंगे कि परम सत्य निराकार ही नहीं है, साकार भी हैं और श्रीकृष्ण ही पूर्ण परमेश्वर हैंI

 हमारा समस्त वैदिक वांग्मय 4  वेदों, 108 उपनिषद, 18 पुराण, वेदांत सूत्र और भगवत गीता आदि को समाहित करता हैI इन शास्त्रों का ज्ञान जब हम गुरु शिष्य परंपरा के माध्यम से प्राप्त करते हैं, तब हम भगवान की अलग-अलग अनुभूतियों को जान पाते हैं , और उनके साकार रूप को समझ पाते हैंI वैदिक ग्रंथों में एक प्रमुख ग्रंथ है, श्रीइशोपनिषद जिसके 18 मंत्रों के द्वारा परम सत्य की विस्तारपूर्वक व्याख्या हुई हैI जैसा कि उपनिषद का अर्थ है परम सत्य के निकट”  तो श्रीइशोपनिषद ग्रंथ जो कि शुक्ल यजुर्वेद का भाग है,  हमें परम सत्य का पूर्ण ज्ञान प्रदान करता है यहां पर हम श्री इशोपनिषद के आधार पर निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत भगवान के व्यक्तिगत स्वरूप को स्थापित करेंगे।

1.      मायावाद (शून्यवाद और निर्विशेषवाद) का खंडन

2.      भगवान की असीम एवंअचिंत्य शक्तियां

3.      परम सत्य की अलग-अलग अनुभूतियां

4.      भगवान का व्यक्तिगत तेजमय रूप

5.      परम सत्य पूर्ण परमेश्वर भगवान श्री कृष्ण

मायावाद (शून्यवाद और निर्विशेषवाद) का खंडन

इशोपनिषद के प्रारंभ में ही ईश स्तुति में स्पष्ट रूप से परम सत्य को  पूर्णम”  कहां गया है

oṁ pūrṇam adaḥ pūrṇam idaṁ

pūrṇāt pūrṇam udacyate

pūrṇasya pūrṇam ādāya

pūrṇam evāvaśiṣyate

आदि शंकराचार्य के बाद शंकराचार्य तात्पर्य में प्रभुपाद बताते हैं कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान ही परम सत्य हैं निर्विशेषब्रह्म या परमात्मा की अनुभूति परम पूर्ण की अधूरी अनुभूति हैI  बहुत सरल रूप से हम यह समझ सकते हैं कि जब हम साकार हैं, हमारे चारों ओर दृश्य जगत साकार है तो यह कैसे संभव है कि इसका उद्गम, इसका रचयिता, इसका सृष्टिकर्ता बिना आकार का होI भगवान अपनी सृष्टि की अपेक्षा किसी भी तरह से कम नहीं हो सकते, नहीं तो वह पूर्ण नहीं होंगेI

 परम सत्य की निराकार अवधारणा निराधार है, क्योंकि ईश स्तुति में उन्हें पूर्णम”   कहा गया है ईश स्तुति में निम्नलिखित मायावादी वाक्यों को परास्त किया गया है

1.      भगवान का रूप नहीं है

 भगवान पूर्ण है बिना रूप के वे अपनी रचना से निम्न है

2.      भगवान की शक्तियां नहीं है

 भगवान से शक्तियां निकलती हैं वह शक्तिमान हैं

3.      जीव भगवान है

जीव पूर्ण भगवान से उद्धृत है नकि पूर्ण है

4.      भौतिक जगत मिथ्या है

 जो भी पूर्ण से आता है पूर्ण है

भगवान की असीम एवंअचिंत्य शक्तियां

Virat roop | Iskcon krishna, Krishna, Lord krishna wallpapers मंत्र 4 (असीम) और मंत्र 5 (अचिंत्य) में भगवान की असीम, अचिंत शक्तियों को उल्लेखित किया गया हैI  मंत्र 4 के अनुसार भगवान अपने धाम में स्थित होते हुए मन की गति से भी तेज चलते हैं , दौड़ने में सबसे तेज हैं, वह सर्वत्र विद्यमान हैं, वे श्रेष्ठता में सबसे आगे हैंI  इस प्रकार का वर्णन अर्थात इस तरह चलना, दौड़ना , देवताओं को अपने वश में रखना, श्रेष्ठता में आगे होना, उनके साकार रूप का स्पष्ट समर्थन करता हैI

मंत्र 5 में परमेश्वर की अचिंत्य शक्तियों को बताया गया है, कि परमेश्वर चलते हैं और नहीं भी चलते, वह दूर भी हैं और निकट भी हैं,  वह सबके भीतर भी हैं और बाहर भी हैं , यह सभी विरोधाभासी कथन भगवान की अचिंत्य शक्तियों को उद्धृत करते हैंI  परम सत्य भगवान अचिंत्य हैंI  जीव अपनी अपूर्ण इंद्रियों के द्वारा पूर्ण परम सत्य को नहीं समझ सकता,  यदि हम नहीं देख सकते तो इसका तात्पर्य यह नहीं है,  कि परम सत्य भगवान कोई रूप नहीं है,  वह निराकार हैI

 मंत्र 8 में वर्णित हुआ है, कि भगवान हमारे जैसे रक्त, हड्डी, मांस आदि से नहीं बने हैंI  हम एक यंत्र की भांति हैं ( BG18.61) जबकि भगवान दिव्य हैं

īśvaraḥ sarva-bhūtānāṁ
hṛd-deśe ’rjuna tiṣṭhati
bhrāmayan sarva-bhūtāni
yantrārūḍhāni māyayā (18.61)

ब्रह्म समिता (5.32) में यह बताया है, भगवान अपनी किसी भी इंद्री से दूसरी इंद्री का काम कर सकते हैंI  इसका अर्थ यह हुआ, कि भगवान अपने हाथों से चल सकते हैं, अपने पांव से वस्तुओं को पकड़ सकते हैं, अपने हाथों ,पैरों से देख सकते हैं, अपनी आंखों से खा सकते हैं….. इत्यादि इत्यादि I नास्तिक इन असीमित शक्तियों का अनुभव अपनी अपूर्ण इंद्रियों और बुद्धि के शुष्क चिंतन से नहीं कर सकता

परम सत्य की अलग-अलग अनुभूतियां

सूर्य ब्रह्म रूप है - ब्रह्मज्ञान वाणी  परम सत्य का बोध ज्ञान की तीन अवस्थाओं में होता है ब्रह्म या नेर विशेष सर्वव्यापी चेतना परमात्मा या भगवान का अंतर्यामी रूप जो समस्त जीवो के ह्रदय में विद्यमान है तथा भगवान या श्री भगवान कृष्ण श्रीमद्भागवत ( 1.2.11) में परम सत्य की यह तीनों अनुभूतियां इस प्रकार बताई गई हैं:-

vadanti tat tattva-vidas
tattvaṁ yaj jñānam advayam
brahmeti paramātmeti

bhagavān iti śabdyate

 प्रभुपाद ने तीनों दिव्य पक्षों को सूर्य के दृष्टांत द्वारा समझाया है, क्योंकि उसकी भी तीन भिन्न-भिन्न पक्ष होते हैंI यथाधूप( प्रकाश), सूर्य की सतह तथा सूर्यलोक स्वयंI  जो नौसिखिया सूर्यप्रकाश (उसकी विश्वव्यापी तथा उसकी निर्विशेषप्रकृति ) के अखंड तेज के ज्ञान से ही संतुष्ट हो जाता है, वह उस व्यक्ति के समान है, जो परम सत्य के ब्रह्म रूप को ही समझ सकता हैI मंत्र 15 में जिस तेज को हटाने की प्रार्थना की जा रही है, जिससे भगवान के मुख कमल काSupersoul & Paramatma | Krishna.com दर्शन हो सके, वह तेज यही ब्रह्म रूप है, जो भगवान के दिव्य शरीर की अंग कांति है I जो व्यक्ति कुछ अधिक जानकार हैं ,वह सूर्य के गोले के विषय में जान सकता है, जिसकी तुलना परम सत्य के परमात्मा स्वरुप से की जाती हैI  जो व्यक्ति सूर्यलोक के अंतर में प्रवेश कर सकता है, उसकी तुलना उससे की जाती है, जो परम सत्य के साक्षात रुप की अनुभूति प्राप्त करता हैI अतः जिन भक्तों ने परम सत्य के भगवान स्वरूप का साक्षात्कार किया है, जो सर्वोच्च अध्यात्म वादी हैं, और निर्विशेषवादी जिस परम सत्य को निर्विशेषब्रह्म ज्योति कहते हैं,  उसका भी श्रोत स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैI  भगवत गीता (3.8)

khudaniya: PARMATMAahaṁ sarvasya prabhavo
mattaḥ sarvaṁ pravartate
iti matvā bhajante māṁ
budhā bhāva-samanvitāḥ

मैं समस्त आध्यात्मिक तथा भौतिक जगत का कारण हूं I प्रत्येक वस्तु मुझसे ही से उद्धृत हैI जो बुद्धिमान यह भलीभांति जानते हैं, वे मेरी प्रेमा भक्ति में लगते हैं, तथा हृदय से पूरी तरह मेरी पूजा में तत्पर होते हैं

 भगवत गीता( 14.27)

brahmaṇo hi pratiṣṭhāham
amṛtasyāvyayasya ca
śāśvatasya ca dharmasya
sukhasyaikāntikasya ca

मैं उस निराकार ब्रह्म का आधार हूं, जो अमर, अविनाशी तथा शाश्वत है ,और परमसुख का स्वाभाविक पद हैI

भगवान का व्यक्तिगत तेजमय रूप

 इशोपनिषद के मंत्र 8 में भगवान के व्यक्तिगत स्वरूप का वर्णन हुआ हैI  हमारा शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना हुआ है, रक्त मांस आदि से. जबकि भगवान का शरीर दिव्य है , जैसा कि ब्रह्म संहिता (5.1)में कहा गया है, सच्चिदानंद विग्रह

 मंत्र 8 में वर्णित अकायम स्नाविरम इसी तथ्य की पुष्टि करते हैंI  मंत्र 5 में उनके आध्यात्मिक निवास स्थान को बताया गया है, जो इस भौतिक जगत से परे हैI  ऐसे भगवान जिनका धाम है, निवास है, वह केवल निराकार ही कैसे हो सकता है साकार शक्तियों का स्वामी निराकार नहीं हो सकताI

 मंत्र 15 की प्रार्थना में कहा गया है, कि हे भगवान कृपया आप अपने तेज को हटा लीजिए जिससे आपके असली मुख्य मंडल का दर्शन हो सकेI  इस प्रार्थना में उनके मुख कमल के दर्शन का आग्रह है, ज़ो यह इंगित करता है कि भगवान का मुख है ,अर्थात भगवान निराकार ही नहीं है, बल्कि एक सुंदर मुख वाले व्यक्ति हैं I

 

भगवान कौन है?

 श्री कृष्ण परम भगवान हैं इसकी पुष्टि विभिन्न प्रमाणिक वैदिक स्रोतों में की गई है जो कि निम्नलिखित हैं

How Beautiful is Krishna? - Friends of Vaishnavas - Mediumअथर्ववेद (गोपाल तापसी उपनिषद 1.24)  ब्रह्मा के सृजन के पूर्व जो विद्यमान थे तथा जिन्होंने ब्रह्मा को वैदिक ज्ञान प्रदान किया, वे भगवान श्री कृष्ण ही हैंI

 नारायण उपनिषद (1)तब परम पुरुष नारायण ने जीव की उत्पत्ति करनी  चाही तथा नारायण से ब्रह्मा उत्पन्न हुए I नारायण ने सारे प्रजातियों और इंद्र को उत्पन्न किया नारायण ने आठों सु बनाएं, नारायण ने 11 रूद्र को उत्पन्न किया, नारायण ने 12 आदित्यो की सृष्टि की

 नारायण उपनिषद (मंत्र 4) भी कहते हैं कि देवकी पुत्र कृष्ण परम ईश्वर हैं

 श्रीपाद शंकराचार्य ने भी स्वीकार किया है, यद्यपि श्रीपाद शंकराचार्य ना तो वैष्णव थे, ना ही सगुण वादी (भगवत गीता महत्तम की भी रचना शंकराचार्य ने की)

 अथर्ववेद (महा उपनिषद -1) का भी या कथन है, “ जब ब्रह्मा, शिव, अग्नि,   जल,   तारे,   सूर्य- चंद्रमा थे तब प्रारंभ में केवल नारायण ही थेI  भगवान कभी अकेले नहीं रहते, वे इच्छा अनुसार सृष्टि कर लेते हैंI”

 मोक्ष धर्म में भी श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है, प्रजापतियो और रुद्रो की सृष्टि की हैI उन्हे मेरा पूर्ण ज्ञान नहीं है  क्योंकि वह मेरी माया शक्ति द्वारा आच्छादित हैI

ब्रह्म पुराण में भी कहा गया है,  नारायण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान है और उन्हीं से चतुर्मुख ब्रह्मा तथा रुद्र प्रकट हुए है जो बाद में सर्वज्ञ बन गए

ब्रह्म अस्मिता (5.1) में ब्रह्मा जी कहते हैं, किपरमेश्वर तो श्री कृष्ण गोविंद है जो प्रत्येक जीव को आनंद प्रदान करने वाले  तथा समस्त कारणों के कारण हैं”

श्रीमद्भागवत के परिभाषा सूत्र मंत्र  (1.3.28) में बताया गया है “सभी अवतार या तो पूर्ण अंश या भगवान के पूर्ण अंश के अंश हैं, लेकिन भगवान श्री कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हैं।

अतः उपयुक्त प्रस्तुत की गयी व्याख्याए और सन्दर्भ के आधार पर उपसंहार स्वरूप में हम यह कह सकते हैं, कि भगवान निराकार ही नहीं, अपितु साकार भी हैं और श्री कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हैंI  निराकार अनुभूति उनकी आंशिक अनुभूति है और श्री कृष्ण की भक्तिमय सेवा ही जीव का परम लक्ष्य हैI

 

 

 

 हरे कृष्ण हरे कृष्ण

कृष्ण कृष्ण हरे हरे

हरे राम हरे राम

राम राम हरे हरे

Comments